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तिरंगे का अस्तित्व खत्म करने की साजिश है भगवा … ये रहे सबूत

दरअसल देश में जितना तीन रंग के झंडे से दंगा उत्पन्न नहीं हुआ उतना एक रंग के झंडे से हो रहा है और दंगा भी किसी वर्ग विशेष मुसलमान हिंदुओं के बीच ही होता है ऐसा क्यों है इतिहास में कुछ सच है जो आप देखिए और समझ लीजिए.

मुस्लिम भगवा झंडा मराठाओं के साम्राज्य का प्रतीक माना जाता है जिसको हिंदुस्तान के लोकतंत्र एवं संविधान से कोई लेना देना नहीं है बल्कि यह झंडे का प्रदर्शन यह दर्शाता है कि भारत में तिरंगा तो सिर्फ मजबूरी है भगवा बहुत जरूरी है .

 

क्या पहचान है भगवा झंडे की

मराठा साम्राज्य मराठा महासंघ एक भारतीय साम्राज्यवादी शक्ति थी। जो सन् 1674 से 1818 तक अस्तित्व में रही । मराठा साम्राज्य की नीव  शिवाजी ने 1664 में डाली । यह साम्राज्य 1818 तक चला और लगभग पूरे भारत में फैल गया। मराठा साम्राज्य का प्रतीक था भगवा झंडा। छत्रपति शिवाजी समेत रामराज तथा कोल्हापुर वंश के कई दिग्गज मराठाओं का साम्राज्य तमाम संघर्षों के बावजूद आजादी के कुछ समय बाद तक कोल्हापुर वंश के साहू जी द्वितीय को 1947 से 1949 तक छत्रपति की पदवी मिलती रही। मराठा साम्राज्य की पदवी तो बची रही लेकिन 27 वर्षों के लगातार औरंगजेब और मुगलों से युद्ध में भगवा झंडा विलुप्त हो गया था या क्षेत्रीय हो गया था।

 

पुनः RSS ने अस्तित्व में लाया भगवा झंडा

RSS मतलब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिसकी स्थापना 1925 में डॉक्टर केशव हेडगेवार द्वारा की गई थी,  लेकिन महात्मा गांधी की धर्मनिरपेक्ष सोच के कारण RSS की चाल नहीं चल पाती थी। भारत की सभी जातियां, वर्ग गांधीजी से अत्यधिक प्रभावित थे। वहीं दूसरी ओर डॉक्टर हेडगेवार भगवा झंडे एवं हिंदू राष्ट्र का सपना देख रहे थे। नतीजन जब गांधी पर कट्टर हिंदूवादी विचारधारा का जोर नहीं चला तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक के नाथूराम गोडसे समेत अन्य लोगों द्वारा गांधी जी की हत्या की साजिश रची और 30 जनवरी1948 को अंजाम दे दिया। जिसके बाद RSS संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया गया लेकिन फिर भी शासन की नजरों से बचते हुए RSS अपनी जमीनें तलाशता रहा।

 

आपातकाल के बाद बढ़ी RSS की राजनीतिक पूछ-परख

RSS की स्थापना के 50 वर्ष बाद सन 1975 में जब आपातकाल की घोषणा की गई तो तत्कालीन जनसंघ पर भी संघ के साथ प्रतिबंध लगा दिया गया, लेकिन इमरजेंसी के हटने के बाद जनसंघ का विलय जनता पार्टी में हुआ मोरारजी देसाई मिलीजुली सरकार के प्रधानमंत्री रहे 1975 के बाद धीरे-धीरे इस संगठन का महत्व बढ़ता गया और इसकी परिणति भाजपा जैसे राजनीतिक दल के रूप में हुई। जिसे आम तौर पर संघ की शाखा के रूप में देखा जाता है।

 

RSS सन 1947 से कर रही है तिरंगे झंडे का विरोध

तिरंगे के नाम पर सदैव राजनीतिक पृष्ठभूमि को मजबूत पकड़ बनाने के लिये राष्ट्रवाद का दावा करने वाली संगठन RSS ने सबसे पहले तिरंगे का विरोध किया था। RSS मराठा साम्राज्य की पहचान भगवा झंडे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में देखने का पक्षधर था।

 

मुखपत्र ‘ऑर्गनाइजर’ में कहा ‘तिरंगा नहीं भगवा हो राष्ट्रीय ध्वज’

संघ ने अपने मुखपत्र ऑर्गनाइजर के 17 जुलाई 1947 के ‘राष्ट्रीय ध्वज’ वाले शीर्षक के संपादकीय में भी तिरंगे का विरोध किया भगवा झंडे को राष्ट्रीय ध्वज स्वीकारने की मांग की लेकिन संघ की यह मांग एक सपना बन कर रह गया।

http://www.thehindu.com/news/national/sardar-patel-insisted-rss-must-accept-national-flag/article7838627.ece

 

मराठा साम्राज्य को पुनः स्थापित करना चाहता है संघ

संघ के भगवा प्रेम एवं मनुस्मृति ग्रंथ पर भी विरोधी हमेशा आलोचना करते रहे हैं। विरोधियों एवं कुछ इतिहासकारों का मानना है कि संघ भारत ने पुनः मराठा साम्राज्य को स्थापित करना चाहता है। संघ धर्मनिरपेक्षता का कट्टर विरोधी है। राष्ट्रीय ध्वज कई वर्षों तक संघ कार्यालय पर न फहराए जाने के कारण भी संघ को हमेशा आलोचकों का सामना करना पड़ता है। संविधान के कुछ विशेषज्ञों से जानने की जिज्ञासा रखते हुए मनुस्मृति और भारतीय संविधान में कुछ खास अंतर पूछे तो स्पष्ट रुप से कुछ कहने से कतराते रहे लेकिन मानना यह है कि संघ पुनः मराठा साम्राज्य स्थापित करके छत्रपति एवं पेशवाओं के तर्ज पर चलाया जाने वाले देश बनाने की कोशिश हमेशा करता रहा है । इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए जानकारी यहा तक पहुंच गई लोग बताते हैं कि, संघ का कोई भी कार्यवाहक ‘गैर मराठा’ नहीं होता संघ प्रमुख पदों पर गैर मराठों को रखने से हमेशा परहेज किया है। जिससे कुछ मायने में साफ दिखाई देता है कि संघ की मराठा साम्राज्य की कल्पना कितनी हद तक सही है।

मराठा साम्राज्य का प्रमुख धर्म ग्रंथ है मनुस्मृति जिसमें जाति-पाति वर्ण व्यवस्था कुरीतियों का संग्रह भी है।जिसे धर्मनिरपेक्ष देश में लागू करना संभव नहीं है।इसलिए संघ अपनी पृष्ठभूमि को मजबूत करने के लिए बार-बार राष्ट्रप्रेम की अलाव जलाते रहता है।

 

तिरंगा नहीं भगवा झंडा की वजह से हुआ कासगंज में दंगा

26 जनवरी 2018 गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर उत्तर प्रदेश के कासगंज में हिंदू मुसलमानों के बीच दंगा हुआ कारण था कि हिंदुओं के द्वारा तिरंगा यात्रा निकालने का विरोध मुसलमानों ने किया,कथित रूप से।

जिसको लेकर तनाव उत्पन्न हुआ दोनों पक्षों के बीच हिंसात्मक संघर्ष में एक हिंदू युवक को अपनी जान एवं एक मुस्लिम युवक को अपनी आंख गंवानी पड़ी।आजतक एवं एबीवीपी न्यूज के खबर के मुताबिक कासगंज में बवाल तिरंगे को लेकर नहीं हुआ। सच्चाई यह है कि मुसलमान बस्ती में गणतंत्र दिवस का कार्यक्रम की तैयारी पहले से चल रही थी।मुसलमानों द्वारा कुर्सियां रास्ते में लगाई गई थी । उसी तरफ से ABVP एवं विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता तिरंगा रैली निकाल रहे थे। तिरंगा रैली के वीडियो में साफ संघ, हिंदू परिषद का एजेंडा दिखाई पड़ता है, मतलब तिरंगे के साथ भगवा झंडे की रैली भी शामिल थी।

The Indian Express में छपी रिपोर्ट के अनुसार मुस्लिमों ने रैली निकालने वालों से कहा कि रैली का रास्ता बदल दे या तो उनके कार्यक्रम को हो जानेदो, लेकिन हिंदू परिषद के विद्यार्थी विंग एवं कार्यकर्ताओं को मुसलमानों की बात रास न आई नतीजन तमाम मुस्लिम विरोधी नारे लगाते हुए भगवा झंडा फहराने की जिद करने लगे। जिसका विरोध मुस्लिमों द्वारा किया गया तो एक सोची समझी साजिश के तहत हिंसा भड़काने का काम किया गया। जिसमें मासूम युवक चंदन गुप्ता को अपनी जान गवानी पड़ी।

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