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भारत पहला देश है जहाँ जज हो या कंडेक्टर दोनों को न्याय पाने के लिए पहले अपराधी बनना पड़ता है।

हड़कंप एक्सप्रेस स्टाफ। भारत की कानून व्यस्था के निर्माता आज जहाँ भी होंगे उन्हें भी अपने द्वारा बनाये कानून की किताब एवं ढांचों पर तरस आ रहा होगा कि उन्होंने बनाया कुछ, बन गया कुछ। बहन की आँखों में आंसू दिल में डर, सहमी हुई अपने आंसुओं को छुपाते हुए, भाई की रहस्यमयी मौत के राज को तीन साल तक चुप्पी की तिजोरी में बंद करके रखा लेकिन पच्चासी साल के बूढ़े पिता खोखली अस्थियों में पुत्र के रहस्यमयी मृत्यु के दर्द ने तकलीफें तेज कर दी। आँखों में बहते आंसू कुछ बड़े दर्द बयां कर रहे थे। एक जज के पिता के आंसू असहाय के थे या फिर साहस के मेरी समझ में नहीं आ रहा था। सीबीआई के जस्टिस लोया की रहस्यमयी मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। मृतक जज के बहन के अनुसार उनके भाई की मौत नहीं हुई बल्कि उनकी एक रणनीति के तहत हत्या की गयी थी लेकिन, भारत में काली पट्टी बांधे, हाथ में तराजू लिए न्याय देने का प्रतीक ना जाने कब कहा किस समय न्यायाधीश को जेल,अपराधी को वेळ दे दे समझना मुश्किल है।आज जस्टिस लोया की मौत को तीन वर्ष बीत चुके हैं।बहन के दर्द के आंसू छलक कर बाहर आ गए। ये आंसू “दी कैरावन” मैगजीन तक पहुंची तो चन्द आंसू की बुँदे शैलाब के रूप में तब्दील हो गयी, लेकिन जस्टिस लोहा की बहन एवं उनके पिता के आंसू में डूबने के डर से दिल्ली से लेकर पूरे देश के अख़बार के दफ्तर समेत नेताओं ने चुप्पी की नाव लेकर फरारी काट रहे हैं। पक्ष हो या विपक्ष, प्रिंट हो या इलेक्ट्रॉनिक  मीडिया दोनों ही “दीपावली की खास मुलाक़ात में खटाई पड़ने के डर” से कतरा रहे हैं। इसी दौरान जस्टिस ए.पी.शाह ने हिम्मत जुटाई लेकिन, उनकी हिम्मत भी “कथित” तक सिमित रह गयी फिर भी हम इनको साधुवाद देते हैं, काम से काम कथित टूर पर ही, किसी ने बोलने की हिम्मत तो जुटाई।

मीडिया की भूमिका भी मदारी जैसे हो गयी है सिर्फ मनोरंजन के लिए कुछ भी करेगा ऐसी स्थिति है । गौरी लंकेश के बाद आज एक और पत्रकार की हत्या हुई है। जिसपर कुछ स्थानीय अख़बारों ने “संपादकीय का कॉलम” खाली छोड़ दिया लेकिन, जस्टिस लोया की रहस्यमयी मौत या “हत्या” पर किसी भी बड़े अखबार या “हिन्दुस्तान” के दिल की धड़कन कहकर चीखने चिल्लाने वाले एंकर ने भी मृतक जज की मौत की खबर पर खड़े सवालों की पट्टी भी नहीं चलायी।

वैसे तो बात बात पर जजों का डंडा मुहर्रम, दीपावली मानाने के तौर-तरीकों पर चल जाता है। गरीब शोषित लोगों पर तिरछी नजर रखने वाले अपनी ही बिरादरी के जज की रहस्यमयी मौत की खबर किसी के कानों तक नहीं पहुँच सकी या फिर सिस्टम के खौफ ने सब की आवाज को दबा दिया है।

 

करो या मरो- बोलो “कुबूल है प्रदुम्न के मर्डर का आरोप”

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