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करो या मरो- बोलो “कुबूल है प्रदुम्न के मर्डर का आरोप”

हड़कंप एक्सप्रेस स्टाफ। पुलिस वाले मुझे उल्टा टांगकर मार रहे थे ।पैरों के तलवों पर लाठियां बरस रही थी। मेरे मुँह से एक आवाज आई की “मैंने कोई अपराध नहीं किया” फिर क्या पुलिस वालों ने और भी जुल्म करना शुरू कर दिया। करेंट लगाने लगे। इंजेक्शन देने लगे। दर्द सहने की क्षमता ने मेरा साथ छोड़ दिया था। मै असहाय होकर, अपनी बेगुनाही को साबित करने के मौकों को तलाश बंद कर दिया । पुलिस की बर्बरतापूर्वक दर्द ने सारी सीमाएं पार होने के बाद “बेगुनाह से गुनहगार” बन गया। फिर मेरे जुबान पर सिर्फ एक ही शब्द था “कुबूल है, कुबूल है, कुबूल है, गुनाह-ए हत्या प्रदुम्न कुबूल” है।

 

थाने से न्यायालय ले जाया गया फिर ‘बेगुनाह को गुनाहगार बनाने की मशीनरी’ ने उसे जेल भेज दिया। जेल में भी मैं डरा था कुछ भी कहने से डरता था। कभी-कभार सामूहिक रूप से जेल में लगी टीवी पर न्यूज़ चैनलों को देखता था तो ऐसा लगता था की मानों जीवन समाप्त हो चूका है। क्युकि सभी न्यूज़ चैनल, डिजाइनर पत्रकार, डिजाइन करके दिखा रहे थे की मैंने प्रदुम्न की हत्या कैसे की लेकिन, खुश इस बात से हु की “मेरी बेगुनाही से वो शर्मिंदा” हैं ।

सीबीआइ की जाँच से बेगुनाह साबित हुआ लेकिन, भारत की न्यायिक व्यवस्था में मै अब भी अपराधी हु, क्यों की मै अभी जमानत पर हूँ । मै वह गुनहगार हूँ जो बेगुनाह होते हुए भी अब भी गुनहगार है ।भारत की कानून व्यस्था के पहरेदारों ने गुनेहगार साबित करने की पुरजोर कोशिश करके सफलता हासिल किया था।

 

मै ऐसे जाबांज पुलिस अफसरों को सलाम करता हूँ की जिस प्रकार से गुनाह कुबूल कराया गया या कराया जाता है वाकई खौफनाक है।

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