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The Indian government's new food security plan would cover impoverished families like this one in the city of Allahabad.

भारत में गरीबी के पायदान से मौत का सफर

हड़कंप एक्सप्रेस, भारत में मौत की गुंडागर्दी ने जीने की राह सीखने वालों के गाल पर चार तमाचे जड़ती दिखाई देती है. मौत चाहे ऑक्सीजन की कमी से हो, या फिर कर्ज के बोझ तले दबने के कारण हो दोनों पर ही राजनीती हो जाती है. राजनेता भी टीवी  चैनलों पर दो-दो मिनट की सफाई देकर अपने घरों में दशहरा मानाने चले जाते हैं. जिन्दगी दिन प्रतिदिन सस्ती होती जा रही है. ऐसा प्रतीत होता है अब आदमी और चिकन में एक ही असामनता है. चिकन मरने के बाद खाने के काम आ रहा है. आदमी जलाने के, दफनाने के.

थोड़ा कड़वा है लेकिन, सच है. किसी के मौत का मातम दो मिनट का मौन रखकर जिन्दगी भर के लिए हजारों जिन्दगियों की आवाज को खाक-ए-सुपुर्द कर दिया जाता है. मौत के कारण पर टीवी  चैनल भी ‘प्राइम टाइम’ में एक घंटे की बहस कराकर खानापूर्ति कर लेते हैं. अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि के बाद भारत के लोकतंत्र की संवेदनाएं पुनः कुम्भकरण की नींद सो जाती है. चाहे मौतें बेरोजगारी,गरीबी, भुखमरी के कारण क्यों न हुई हो.

खबर है गरीबी के कारण उन असहाय लोगों की जिन्होंने शासन की नाकामी के कारण अपना एवं अपने परिवार का पेट नहीं पाल पा रहे थे, लिहाजा मौत को गले लगाना उचित समझा.

आकड़े बताते है कि भारत में प्रतिवर्ष लगभग पांच से छह हजार मौते गरीबी के कारण होती है लेकिन, मरने का तरीका आत्महत्या है. इसलिए मरने वालों वालों को गरीबी के नाम पर शहीद तो नहीं कहा जा सकता. इसलिए सरकारें आत्महत्या का ढिंढोरा पीटकर अपना पड़ला झाड़ लेती है लेकिन, इसके पीछे के कारण पर कोई इसलिए नहीं डालता ‘कही कुर्सी का पायदान खतरे में ना पड़ जाय’.

 

भारत में प्रतिवर्ष गरीबी के कारण की गयी आत्महत्या के आकड़ें –

वर्ष                                                                             मौतों की संख्या

2012                                                                            2291

2013                                                                            1866

2014                                                                            1699

2015                                                                             1699

2016                                                                             1900 (सिर्फ २०१६ के आंकड़े स्पष्ट नहीं है )

क्या यही है शाइनिंग इंडिया-

खबरे तो बहुत सी मौत की आती है लेकिन, गरीबी के कारण आत्महत्या की खबरों को न जाने क्यों छुपा लिया जाता है. भारत के प्रधानमंत्री की शाइनिंग इंडिया की परिकल्पना पर कालिख पोतने वाली ख़बरों को गोदी मीडिया डकार जाता है. जब हिन्दू मुस्लमान के मुद्दे पर ही दिनभर उन्माद फैला रहा होता है. उसी दौरान किसी गरीब परिवार का मुखिया अपने परिवार का पेट पालने में असफल होने के कारण मौत को गले लगा रहा होता है. राष्ट्रवादी संगठन भी गरीबी से बढ़ रही मौतों को रोकने में असफलता को छिपाते हुए, चीन निर्मित फुलझड़ी पर रोक लगाने की हाय तौबा मचा रहा होता है. इधर गरीब की बेटी के विवाह पर रोक पैसे के आभाव में गरीबी लगा जाती है.

 

सरकार को धराशायी करते सरकारी आकड़े-

गरीबी के कारण हो रही मौतों का आकड़ा मेरा नहीं सरकार का है. आपको जब ‘योगगुरु’ से फुर्सत मिल जाये तो ‘गूगल’ गुरु से पूछ लीजिये. आकड़ों को देख आपके चेहरे की हवाइयां उड़े न उड़े मेरे तो उड़ चुकी हैं. शायद आपको भी ‘देशभक्ति’ से फुर्सत मिले तो इन मौतों पर थोड़ा तरस तो आ ही जायेगा. तरस आ जाये तो सरकार से सवाल कर लीजिए. आपको भी थोड़ा ‘नैतिक जिम्मेदारी’ राष्ट्र के नागरिकों के लिए निभानी चाहिए .

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